H-1B वीज़ा की नई फीस: क्या भारतीय टेक इंडस्ट्री का American Dream खतरे में है?
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- 24 सित॰
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हाल ही में, अमेरिकी सरकार ने नए H-1B वीज़ा आवेदनों के लिए $100,000 (लगभग 83 लाख रुपये) की चौंकाने वाली फीस लगाने का फैसला किया है। पहले यह फीस करीब $2,000 से $5,000 (लगभग 1.6 लाख से 4 लाख रुपये) थी, इसलिए यह एक बहुत बड़ी बढ़ोतरी है। इस बदलाव से अमेरिका में भारतीय प्रोफेशनल्स को भेजने का पूरा गणित बदल गया है। इसका सीधा और गहरा असर भारतीय IT प्रोफेशनल्स और उन्हें काम देने वाली कंपनियों पर पड़ रहा है।
यह विश्लेषण बताता है कि H-1B वीज़ा फीस बढ़ने का इंडस्ट्री और स्किल्ड वर्कर्स पर क्या असर पड़ेगा।

भारतीय IT कंपनियों पर वित्तीय बोझ
प्रमुख भारतीय IT कंपनियों पर यह वित्तीय बोझ कोई बहस का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे-सीधे पैसों का हिसाब है। Infosys और TCS जैसी कंपनियाँ, जो H-1B वीज़ा पर बहुत ज़्यादा निर्भर करती हैं, इस बदलाव से सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगी।
हाल ही में Jefferies की रिपोर्ट के अनुसार, Infosys पर इसका सबसे ज़्यादा असर होगा। Infosys के 3.3% कर्मचारी H-1B वीज़ा पर हैं और कंपनी की 11.5% आय इन कर्मचारियों से जुड़ी है।
TCS एक बड़ी कंपनी है, लेकिन इसकी निर्भरता थोड़ी कम है। इसके 2.2% कर्मचारी इस वीज़ा पर हैं और इसकी 7.7% आय इससे जुड़ी है।
गणित बिल्कुल सीधा है: भारतीय IT कंपनियाँ आमतौर पर अमेरिका-आधारित प्रोजेक्ट्स पर 10% मुनाफ़ा कमाती हैं। यह नई $100,000 की फीस एक ही वीज़ा होल्डर से पाँच से छह साल का मुनाफ़ा खत्म कर सकती है। इससे उनका पारंपरिक ऑनसाइट (onsite) मॉडल अब टिकाऊ नहीं रह गया है। इसका भारतीय टेक इंडस्ट्री पर गहरा असर पड़ेगा।
भारतीय शेयर बाजार पर Domino Effect
H-1B वीज़ा पॉलिसी में इस बदलाव से भारतीय शेयर बाजार में पहले से ही नकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। सोमवार को, TCS, Infosys और Wipro जैसी बड़ी भारतीय IT कंपनियों के शेयर 2.26% से 3.88% तक गिर गए, जिससे निवेशकों की घबराहट साफ दिखी। यह गिरावट दिखाती है कि भारतीय IT सेक्टर का भविष्य अमेरिकी वीज़ा नीतियों से कितना जुड़ा हुआ है।
राजनीतिक और विशेषज्ञ राय
इस मुद्दे ने भारत में एक मजबूत राजनीतिक प्रतिक्रिया को जन्म दिया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है, खासकर तेलुगू IT प्रोफेशनल्स के लिए, जो सभी भारतीय H-1B वीज़ा होल्डर्स का अनुमानित 70% हिस्सा हैं। यह राजनीतिक दबाव H-1B वीज़ा मुद्दे को और भी जटिल बनाता है।
Forrester Research India और Everest Group जैसी विशेषज्ञ फर्मों ने कंपनियों को जल्द से जल्द नए तरीके अपनाने की सलाह दी है। उनकी सलाह है:
तेजी से Offshoring: इस नई फीस के कारण भारत से काम कराना ज़्यादा किफ़ायती होगा, जिससे भारत में घरेलू हायरिंग बढ़ सकती है।
स्थानीय हायरिंग बढ़ाना: कंपनियों को अमेरिका में ही ज़्यादा स्थानीय टैलेंट को हायर करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे अमेरिकी कर्मचारियों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी।
विकेंद्रीकरण (Diversification): कंपनियाँ अब दूसरे वीज़ा विकल्पों का इस्तेमाल कर सकती हैं या मेक्सिको और कनाडा जैसे पास के देशों में अपना काम शिफ्ट कर सकती हैं।
H-1B वीज़ा फीस: पुराना बनाम नया खर्चा
यह समझने के लिए कि फीस में कितनी बड़ी बढ़ोतरी हुई है, आइए एक ही H-1B आवेदन के खर्चों पर नज़र डालते हैं।
फीस का प्रकार | पुराना खर्च (US$) | नया खर्च (US$) |
I-129 फाइलिंग फीस | $780 | $780 |
ACWIA ट्रेनिंग फीस | $1,500 | $1,500 |
धोखाधड़ी रोकथाम और पता लगाने की फीस | $500 | $500 |
शरणार्थी कार्यक्रम फीस | $600 | $600 |
पब्लिक लॉ 114-113 फीस | $4,000 | $4,000 |
नई वीज़ा फीस | $0 | $100,000 |
कुल अंदाजित खर्च | ~$7,380 | ~$107,380 |
यह नई लागत संरचना सबसे जरूरी रोल के लिए भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि प्रति वीज़ा आवेदन की कुल कीमत लगभग 1,400% बढ़ गई है।
कंपनी का प्रकार/स्थिति | नई फीस से पहले का कुल खर्च (लगभग) | नई फीस के बाद का कुल खर्च (लगभग) |
छोटी कंपनी (≤25 कर्मचारी), नया H-1B आवेदन, पब्लिक लॉ 114-113 पेनल्टी नहीं | ~$7,000-$8,000 | ~$107,000-$108,000 |
बड़ी कंपनी (≥26 कर्मचारी), पब्लिक लॉ 114-113 के तहत | ~$11,000-$12,000 | ~$111,000-$112,000 |
भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए H-1B वीज़ा के विकल्प
बहुत से लोग यह सोच रहे हैं कि अब क्या? यहाँ कुछ वैकल्पिक वीज़ा विकल्पों पर एक नज़र डालते हैं:
L-1 वीज़ा (Intracompany Transferee): यह वीज़ा कंपनियों को अपने विदेशी कार्यालय से किसी कर्मचारी को अमेरिका के कार्यालय में ट्रांसफर करने की अनुमति देता है। यह अक्सर मैनेजर्स और खास जानकारी वाले कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल होता है।
O-1 वीज़ा (Extraordinary Ability): यह उन लोगों के लिए एक विकल्प है जिनके पास अपने क्षेत्र में बहुत ज़्यादा विशेषज्ञता है। इसके लिए योग्यता का पैमाना बहुत ऊँचा है, लेकिन इसमें सालाना कोई सीमा नहीं है।
TN वीज़ा (Trade NAFTA): यह सिर्फ कनाडा और मेक्सिको के प्रोफेशनल्स के लिए है, न कि भारतीयों के लिए। हालाँकि, यह दिखाता है कि क्षेत्रीय व्यापार समझौते कैसे प्रोफेशनल मूवमेंट को आसान बना सकते हैं।
भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए कुछ ज़रूरी सवाल-जवाब
सवाल: मेरे मौजूदा H-1B वीज़ा का क्या होगा?
जवाब: व्हाइट हाउस से मिली जानकारी के अनुसार, यह नई फीस मौजूदा H-1B वीज़ा होल्डर्स, उनके वीज़ा रिन्यूअल या जो लोग पहले से ही देश में हैं, उन पर लागू नहीं होगी। अमेरिका में आने-जाने पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।
सवाल: क्या नई $100,000 की फीस से कोई छूट है?
जवाब: यह फीस नए आवेदनों के लिए अनिवार्य है, लेकिन कुछ खास इंडस्ट्री जैसे कि हेल्थकेयर और इंजीनियरिंग में कुछ छूट मिल सकती है। यह पॉलिसी वीज़ा रिन्यूअल पर भी लागू नहीं होती है।
निष्कर्ष: भारतीय टेक प्रोफेशनल्स के लिए एक नया मोड़
यह नई फीस सिर्फ एक वित्तीय बोझ नहीं है; यह एक बड़ा कदम है जो भारतीय IT इंडस्ट्री की सहनशीलता और हज़ारों स्किल्ड प्रोफेशनल्स की उम्मीदों की परीक्षा लेगा। हालाँकि, यह साफ हो गया है कि यह फीस रिन्यूअल पर लागू नहीं होती, जिससे शुरुआती घबराहट कुछ कम हुई है, लेकिन H-1B वीज़ा होल्डर्स पर इसका लंबा असर होगा।
बड़ी संख्या में प्रोफेशनल्स को अमेरिका भेजने का पारंपरिक मॉडल अब खतरे में है, जिससे कंपनियों को अब ऑटोमेशन, स्थानीय हायरिंग और ज़्यादा offshoring की तरफ बढ़ना होगा। भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए, इस बदलाव का मतलब हो सकता है कि अब उनकी प्रतिभा और कौशल का इस्तेमाल भारत में तेजी से बढ़ते घरेलू टेक सेक्टर में किया जाए। यह भारत को सिर्फ सर्विस देने वाले देश से प्रोडक्ट इनोवेशन का ग्लोबल हब बना सकता है। यह भारत-अमेरिका के तकनीकी संबंधों और भारतीय IT प्रोफेशनल्स के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है।
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